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श्री दिव्यनाथ धाम हरिद्वार एवं कुरुक्षेत्र के मध्य स्थित है जो आदिकाल से परमात्मा की मूल स्थली है श्री दिव्यनाथ धाम हरिद्वार से करीब 120 किलो मीटर एवं कुरुक्षेत्र से लगभग 80 किलोमीटर दूर है जहां पर परमात्मा स्वयं पालनहार के रूप में विद्यमान रहते हैं यहां परमात्मा श्री विष्णु के रूप में मौजूद हैं जो संसार के पालन करता कहे जाते हैं इस भूमि पर परमात्मा अपने सर्वोच्च रूप एवं सर्वोच्च वरदान देने वाली शक्ति के रूप में मौजूद रहते हैं परमात्मा ने वरदान स्वरुप पतित पावनी मां यमुना को भी जीवन दयानी स्वरूप देते हुए इसी जगह पर राजघाट नाम से स्थान दिया है lat 30.064980, log 77.351699
श्री दिव्यनाथ धाम जगत का पालन करने वाले भगवान विष्णु का मूल स्थान है पौराणिक धार्मिक ग्रंथो और पुराणों में इसे बैकुंठ के नाम से भी जाना गया है (ऋग्वेद-1.154.1 एवं 3) की व्याख्या में आचार्य सायण ‘विष्णु’ का अर्थ व्यापनशील (देव) तथा सर्वव्यापक बताते हैं अर्थात वह परमात्मा जो सर्वत्र व्याप्त है और सर्व शक्तियों से संपन्न है जिसे निर्गुण भाव के लोग भी निराकार रूप में इस संसार को नियंत्रित करने वाली सर्वोच्च शक्ति के रूप में मानते हैं सृष्टि निर्माण से पूर्व से ही आदि देव त्रिदेव का यह मूल स्थान रहा है सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने इस स्थान से शुरू की थी तथा सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु इसी स्थान पर अब भी मूल रूप में निवास करते है आज भी आत्मा, परमात्मा के मिलन का सुखद योग यहां देखा जा सकता है और महसूस किया जा सकता है इस स्थान पर आज भी न केवल आत्मिक शांति प्राप्त होती है बल्कि आस्था के अनुसार यहां परमात्मा का दर्शन किया जा सकता है अर्थात आत्मा से परमात्मा का मिलन इसी स्थान पर संभव है इसीलिए इस स्थान को धार्मिक ग्रंथो और पुराणों में दिव्य धाम अर्थात बैकुंठ कहा कहा गया है वैसे तो विष्णु को वाणी में निवास करने वाला भी माना जाता है
विष्णु का परम प्रिय आवास स्थल विष्णु का लोक ‘परम पद’ है अर्थात् जिसे आचार्य सायण ने गन्तव्य रूपेण सर्वोत्कृष्ट लोक बताया है ‘परम पद’ की विशेषता यह है कि यह अत्यधिक अदृश्य शक्तियों से युक्त स्थान है जहां समस्त चमत्कारिक शक्तियां संचरण किया करती हैं। यहां भौतिक पुष्टि का प्राचुर्य अर्थात् आत्मिक उन्नति का बाहुल्य सहज ही अनुमेय है। जो हर स्थिति में परमानन्द का वाचक है, जिसके लिए देवता सहित समस्त प्राणी अभिलाषी भी रहते हैं और प्रयत्नशील भी। इसलिए इस लोक की प्राप्ति की कामना सभी करते हैं। ऋग्वेद मंत्र में यहां पुण्यशाली लोगों का, तृप्ति (आनन्द, प्रसन्नता) का अनुभव करने का भी उल्लेख भी हुआ है।
शास्त्रों एवं पुराणों में वर्णित मोक्ष दायिनी यमराज की बहन यमी के रूप में भी यमुना को यही पूजा जाता है यही कारण है कि यमुनोत्री से निकलकर गंगा एवं सरस्वती के संगम प्रयागराज तक मां यमुना को श्री दिव्य नाथ धाम (राजघाट) के अलावा कहीं पर भी पूजा नहीं जाता है यहां तक की मथुरा से गुजर रही मां यमुना को भी यमुना पूजन के रूप में मथुरा में वह स्थान प्राप्त नहीं है
यमराज और यमी की एक कहानी का विवरण विष्णु पुराण, कुर्म पुराण, और मार्कंडेय पुराण में अलग-अलग जगह पर मिलता है
विष्णु पुराण के अनुसार यमराज एक दिन अपनी बहन यमी से मिलने के लिए उसके घर पहुंच गए यमी यमराज को देखकर के बहुत खुश हुई यमराज को लगा था कि यमराज को अपने दरवाजे पर देख कर सभी लोग दुखी होते हैं तो यमी भी मुझे देखकर दुखी होगी परंतु यमी अपने भाई यमराज को देखकर के बहुत खुश हुई यमी ने यमराज के लिए आसन लगाया आदर सत्कार किया एवं पकवान बनाकर खिलाएं तथा भाई को तिलक लगाकर स्वागत किया यमराज यमी के ऐसे आदर सत्कार से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने यमी को वरदान मांगने के लिए कहा जिस पर यमी ने अपने लिए तो कुछ नहीं मांगा लेकिन यमराज से वरदान मांगा कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन से मिलने के लिए जाएगा, उसका ख्याल रखेगा वह अकाल मृत्यु से दूर हो जाएगा तथा जो बहन आज के दिन अपने भाई का तिलक लगाकर आदर सत्कार करेगी उसे भोजन करावेगी वह भी अकाल मृत्यु के प्रकोप से दूर हो जाएगी पुराणों में भी यमी के यमुना बनने कहानी इसी मिलन से ही उत्पन्न होती दिखाई देती है
यमराज के वरदान को यथार्थ में परिवर्तन करने के लिए यमी ने अपना रूप त्यागना शुरू कर दिया धीरे-धीरे उनकी देह गलने लगी तथा यमी की देह जल धारा के रूप में परिवर्तित हो गई तथा इसी धारा से यमुना का उद्गम माना जाता है यमी के इस त्याग और बलिदान और प्रेम को देखते हुए परमात्मा ने अपने मूल रूप से निवास करने वाले स्थान दिव्यधाम पर ही यमुना को परमधाम राजघाट के नाम से स्थान दिया तथा यह वरदान दिया कि यह घाट राजघाट के रूप में विख्यात होगा तथा यमराज एवं यमी बहन भाई के प्रेम स्वरूप पैदा वरदान को यथार्थ करने के लिए मैं स्वयं पालनहार के रूप में सदैव इस स्थान पर वास करूंगा यमराज और यमी की इस कहानी के बाद दीपावली के बाद पढ़ने वाले भैया दूज त्योहार के दिन इसका विशेष महत्व है तब से ही उत्तर भारत में भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है इस दिन यदि बहन और भाई दोनों दिव्यधाम पर आकर के एक दूसरे का आदर सत्कार कर एक दूसरे को भोजन खिलाते हैं अकाल मृत्यु का संकट हमेशा हमेशा के लिए दोनों के जीवन से दूर हो जाएगा
कलयुग में स्वयं भगवान विष्णु ने मांगा है अपना स्थान दिव्य धाम राजघाट यमुना नदी के किनारे पर मां यमुना को दिए गए वरदान को यथार्थ रूप प्रदान करने के लिए भगवान विष्णु ने राजघाट झरौली पर श्री दिव्यनाथ धाम के नाम से अपना स्थान मांगा है
द्वापर युग में धर्म की स्थापना के लिए जब भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया तो जब कृष्ण को वासुदेव यमुना पार कर रहे थे तो यमुना जी ने भगवान कृष्ण के चरण स्पर्श पश्चात यमुना जी ने अपना जलस्तर इतना काम कर लिया था की वासुदेव भगवान कृष्ण को नंद के घर छोड़ आए थे
